वाकाटक राजवंश
सातवाहनों के पतन के बाद और चालुक्य के उदय के समय इस राजवंश का जन्म हुवा। इसके पूर्वज सातवाहनों के अधीन बरार ( विदर्भ ) के स्थानीय शासक थे। वाकाटक राजवंश ने सबसे पहले पूर्वी मालवा पर, उसके बाद सातवाहनों के प्रदेशों पर अधिकार किया।
वाकाटक राजवंश की जानकारी ( साक्ष्य ) हमें कहाँ से मिलती है?
- वायु पुराण
- अजंता लेख ( लेखक- भगवतशरण उपाध्याय )
- बालाघाट अभिलेख (MP)
प्रमुख शासक :
- विन्ध्यशक्ति - { ( संस्थापक है -पुराणों के अनुसार ) }
- प्रवरसेन I ( वास्तविक संस्थापक )
प्रवरसेन I के पश्चात वाकाटक साम्राज्य दो शाखाओं में विभक्त हो गया :
- मुख्य शाखा , बासीय शाखा ( दोनों शाखाओं ने समानान्तर रूप से शासन किया। )
01. प्रधान / मुख्य शाखा :
- रूद्रसेन I ( प्रवरसेन प्रथम के पौत्र थे। )
- पृथ्वीसेन- I
- रूद्रसेन II
- प्रभावती गुप्त
- प्रवरसेन II
- नरेंद्र सेन
- पृथ्वीसेन II ( अंतिम शासक )
विन्ध्यशक्ति ( लगभग 255 ई. - 275 ) :
- अजंता लेख में इसका नाम - वंशकेतु
- अजंता लेख में विन्ध्यशक्ति को इन्द्र के समान बताया गया।
प्रवरसेन प्रथम ( 275 -335 AD ) :
- इसने चार अश्वमेध यज्ञ किया था। { पुराणों के अनुसार }
- वाकाटक वंश का वह अकेला ऐसा शासक था जिसने सम्राट / महाराजा की उपाधि धारण की थी।
रूद्रसेन प्रथम ( 335 - 360 AD ) :
- पिता - गौतमीपुत्र
- उपासक थे - महाभैरव के
- इसने गुप्तों से मैत्रीपूर्ण समबन्द बनाए इसलिए समुन्द्र गुप्त ने उसके राज्य से युद्ध नही किया।
पृथ्वीसेन प्रथम ( 360 - 385 AD ) :
- पुत्र - रूद्रसेन II ( इसकी शादी चन्द्रगुप्त II की पुत्री प्रभावती गुप्त से हुई थी )
- इस शांतिप्रिया राजा ने कलां और साहित्य में विकास किया।
रूद्रसेन II ( 385 - 390 AD ) :
- पुत्र - दिवाकर सेन, दामोदर सेन
- इसने अपनी पत्नी ( प्रभावती गुप्त ) के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म त्यागा और वैष्णव धर्म अपना लिया ।
- दुर्भाग्य वश इनकी मृत्यु हो गयी ।
- गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन IIसे किया। वाकाटकों का राज्य गुप्त एवं शक राज्यों के बीच था। राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए चन्द्रगुप्त II ने इस संबंध को स्थापित किया था। बिवाह के कुछ समय बाद रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई। चूँकि उसके दोनों पुत्र दिवाकर सेन एवं दमोदर सेन अवयस्क थे अतः प्रभावतीगुप्ता ने शासन संभाला।
प्रभावती गुप्त ने ( 390 - 403 AD ) : 13 वर्ष तक
- दिवाकर सेन की संरक्षिका के रूप में अपने अल्प वयस्क पुत्र के साथ मिलकर अपने पिता के सहयोग से शासन किया। दुर्भाग्यवश दिवाकर सेन की मृत्यु हो गयी ।
दामोदर सेन / प्रवरसेन II ( 410 - 440 AD ) :
- पुत्र - नरेंद्र सेन
- राजधानी - नंदीवर्धन से प्रवपुर कर दी।
- इसने ' प्रवरसेन ' की उपाधि धारण की।
- इसने सेतुबंध की रचना की। सेतुबन्ध प्राकृत भाषा का एक महाकाव्य है। इसे 'रावणवहो' ( रावणवधः) भी कहते हैं।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजकवि कालिदास ने कुछ समय तक प्रवरसेन द्वितीय की राजसभा में निवास किया था। वहाँ उन्होंने उसके सेतुबन्ध का संशोधन किया तथा वैदर्भी शैली में अपना काव्य मेघदूत लिखा।
- बालाघाट से मिले प्रवरसेन के 7 ताम्रपत्र से जानकारी मिली कि उसने अपने राज्य का विस्तार मध्य प्रदेश के कई भाग पर किया।
- इनके बाद इस वंश शासन की शक्ति कम होने लगी।
नरेंद्र सेन ( 440 - 460 AD ) :
- पत्नी - अजित भट्टारिका ( कुंतल की राजकुमारी )
- नलराजा भवदत्तवर्मन ने नरेंद्र वर्मन को हरा दिया और बाद में फिर नरेंद्र वर्मन ने इनको हरा दिया।
पृथ्वीसेन- II ( 460 - 480 AD ) : { प्रमाणित नहीं }
- पृथ्वीसेन- II ने नल शासकों , त्रैकुटकों से काफी संघर्ष किया, इसके बाद वकाटक वंश का पतन हो गया।
- बालाघाट अभिलेख में पृथ्वीसेन- II को परमभागवत की उपाधि दी गई है।
- वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के सामन्त व्याघ्रदेव ने नचना के मंदिर का निर्माण करवाया।
02. बासीय / वरसगुल्म ) शाखा :
- सर्वसेन ( संस्थापक ) ( 330 ई. में )
- हरिषेण (475-510 ई.) ( सर्वाधिक शक्तिशाली शासक , अंतिम ज्ञात शासक )
- वत्सगुल्म स्थान महाराष्ट्र के अकोला जिले में आधुनिक बासीम में स्थित था।
सर्वसेन ( 330 - 350 ) :
- पिता - प्रवरसेन I के छोटे पुत्र
- सर्वसेन ने हरिविजय नामक प्राकृत काव्य-ग्रंथ लिखा।
विशेषताएँ :
- राजधानी - नंदीवर्धन ( महाराष्ट्र के नागपुर जिले में )
- उपासक - शिव व विष्णु के { वाकाटक नरेश ब्राह्मण धर्मालंबी थे। }
- अजन्ता का 16वां तथा 17वां गुहा विहार और 19वें गुहा चैत्य का निर्माण वाकटकों के शासन काल में हुआ।
- संस्कृत की वैदर्भी शैली का पूर्ण विकास वाकाटक नरेशों के दरबार में हुआ।
- इन्होने ब्रहृम्णों को अत्यधिक भूमि दान में दी थी , इसका प्रमाण इनके जारी किये गये ताम्रलेख मिला हैं।
- इन्होने वैदिक धर्म को दक्षिण भारत तक पहुंचाया, इसलिए इनकी तुलना इंद्र और विष्णु से की गई है।
No comments:
Post a Comment